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जर्मनी चांसलर चुनाव: सर्वे में एंगेला आगे, जीतीं तो चौथी बार बनेंगी चांसलर

जर्मनी चांसलर चुनाव: सर्वे में एंगेला आगे, जीतीं तो चौथी बार बनेंगी चांसलर

lt;bgt;बर्लिन. lt;/bgt;जर्मनी में रविवार को संघीय सरकार के लिए वोटिंग हो रही है। मुकाबला मौजूदा चांसलर एंगेला मार्केल की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) एलायंस और प्रतिद्वंद्वी मार्टिन शुल्ज की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसडीपी) के बीच है। कुछ दिन पहले तक इस की संभावना अधिक थी कि पोस्ट ट्रुथ एरा जर्मनी में भी कामयाब हो और डोनाल्ड ट्रम्प की तरह शुल्ज के पक्ष में फैसला आ जाएं, पर अब हालात बदल चुके हैं। हालांकि, एसडीपी के उम्मीदवार शुल्ज यह तर्क दे रहे हैं कि अनडिसाइडेड पीपुल्स की संख्या ज्यादा हो रही है, इसलिए नतीजा अंतिम समय में अनपेक्षित आ सकते हैं। दूसरी तरफ सर्वे में सीडीयू एलायंस 13 फीसदी की बढ़त बनाए हुए है, इसलिए अप्रत्याशित नतीजे की उम्मीद बेहद कम है। माहौल भी एंगेला मर्केल के पक्ष में होने के दो बड़े कारण हैं- पहला उनके नेतृत्व में जर्मनी यूरोपीय संघ का नेतृत्व करने में सफल रहा। दूसरा-उनके नेतृत्व में जर्मनी ने नई वैश्विक छवि निर्मित की। अब देखना है कि मर्केल को रोकने के लिए क्या एसडीपी दक्षिणपंथी पार्टियों से गठबंधन करेगी? सर्वे के नतीजे अगर नतीजों में बदलते हैं तो मर्केल लगातार चौथी बार चांसलर बन जाएंगी। साथ ही वे अपनी ही पार्टी के हेल्मेट कोल की बराबरी करेंगी, जो 16 साल तक जर्मन चांसलर रहे थे। lt;bgt;भारत को फायदा मिलना तय (जी. पार्थसारथी, विदेश मामलों के जानकार रहीस सिंह, विदेश मामलों के जानकार)lt;/bgt; lt;bgt;भारत पर असरlt;/bgt; - जर्मनी में कोई भी जीते, लेकिन चीते (भारत) एवं बाज (जर्मनी) में दोस्ती बरकरार रहेगी। जर्मनी को स्किल्ड ह्यूमन रिसोर्स की जरूरत है और भारत को जर्मन पूंजी के साथ उसकी टेक्नोलॉजी की भी। - जापान के बाद जर्मनी ही सबसे ज्यादा मदद देता है। इसमें और इजाफे की उम्मीद कर सकते हैं। - आतंकवाद के मसले पर जर्मनी भारत का साथ देता आया है। उम्मीद है यह अागे भी जारी रहेगा। - हथियार सप्लाई के लिए भी जर्मनी तैयार हो सकता है। तब भारत के पास ज्यादा विकल्प होंगे। lt;bgt;दुनिया पर असरlt;/bgt; - मर्केल उत्तर कोरिया, ईरान और जलवायु के मसले पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से सहमत नहीं है। ऐसे में अमेरिका के साथ उनकी तनातनी यूं ही बरकरार रहने की उम्मीद है। - यूरोपियन यूनियन ब्रेक्जिट के बाद कमजोर हुआ है, यह यूरोपीय व्यवस्था एवं इकोनॉमी के लिए प्रतिकूल परिणाम वाला रहा। अब वह ज्रेक्जिट नहीं झेल सकता। इसलिए उसकी उम्मीद मर्केल ही हैं। - यूरोप में एकता के लिए मर्केल महत्वपूर्ण कड़ी हैं। प्रमुख मंचों पर जर्मनी और मजबूत हो सकेगा। lt;bgt;ऐसे मजबूत होकर उभरीं मर्केल lt;/bgt; अंगेला मर्केल ने जिस तरह से रिफ्यूजी के मुद्दे पर पहल की और पेगिडा आंदोलन के दबाव में आए बिना शरणार्थियों के लिए दरवाजे खोले, उससे वे मजबूत हुई हैं। विशेषकर उस समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था के नियमों को धता बताने वाली शक्तियां उभर रहीं हों और क्षेत्रीय संगठन तथा राष्ट्रीय राजनीतिक नेशन फर्स्ट;की आड़ में संरक्षणवाद को बढ़ावा दे रही हो, तब मर्केल और महत्वपूर्ण साबित हुईं। lt;bgt;बहस में प्रतिद्वंद्वी मार्टिन पर भारी पड़ीं अंगेला 35% लोगों को मार्टिन पर भरोसा 55% लोग मर्केल के पक्ष में lt;/bgt; ये थे बहस के पैरामीटर: दोनों प्रमुख रुढ़िवादी पार्टियों के प्रत्याशियों ने आक्रामक रवैया, तर्कशक्ति, योग्यता, भरोसेमंद, जनता की पसंद और लोगों के साथ मेलजोल रखने वाले नेता जैसे बिंदुओं पर बहस में हिस्सा लिया। इनमें से मार्टिन शुल्ज केवल लोगों से मेल मिलाप के मामले में ही अंगेला मर्केल को टक्कर दे सके। जबकि बाकी में उन्हें मुंह खानी पड़ी।