नजरिया

... तो क्या तेजबहादुर हार गया ? या फिर ये लोकतंत्र की हार है?

... तो क्या तेजबहादुर हार गया ? या फिर ये लोकतंत्र की हार है?


नरेश गुप्ता।

बीएसएफ के एक जवान तेजबहादुर ने भोजन की शिकायत की थी, और शिकायत अपने आला अफसरों से की या नहीं की लेकिन सोशल मीडिया के जरिए पूरे देश से की। आपसे और हमसे की, क्योंकि अंत में देश हम और आप ही तो हैं और शिकायत को पूरे देश का अभूतपूर्व समर्थन मिला। यहाँ तक कि कुछ राजनीतिक दलों ने और कुछ सरकार में बैठे भाजपा के विचार धारा के सहमत लोगों ने भी उसका समर्थन किया, लेकिन अंततः शिकायत करने के कारण उसको अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। यानि अगर सीधे शब्दों में कहूँ तो “गया बेचारा काम से”।
 
अब यदि हम इस घटना से तेजबहादुर की जीत-हार का कोई मूल्यांकन करेंगे तो ये बेमानी होगा क्योंकि यदि हम मानेंगे कि जिस दिन बेचारे तेजबहादुर को पूरे देश का समर्थन मिला था उस दिन वो जीत गया था तो ये हमारी बेवकूफी होगी और आज उसकी नौकरी जाने के बाद यदि हम ये मानेंगे कि वो हार गया तो ये हमारी नादानी होगी।
 
आपको याद होगा फिल्म सिंघम के एक दृश्य में पुलिस का एक उच्चाधिकारी अपने से कनिष्ठ अधिकारी को समझाता है कि सिस्टम से मत लड़ो क्योंकि सिस्टम हम से नहीं बल्कि हम सिस्टम से हैं और यही वो बात है जो इस सारी बदहाली की जड़ है। जिस दिन सिस्टम हम से होगा वही दिन लोकतंत्र की जीत का होगा। यदि आप इस घटना से केंद्र की मोदी सरकार का मूल्यांकन करेंगे तो शायद उपयुक्त होगा।
 
केंद्र सरकार तेजबहादुर से हार गई है। तेज बहादुर ने आवाज उठा कर अपना नाम सार्थक कर दिया। यद्यपि उसे हारना ही था, क्योंकि जब भी धारा के विपरीत जाकर आप सिस्टम को सुधारने के लिए उसके खिलाफ बोलेंगे तो कुछ कुर्बानियां होनी ही होती हैं। जब तेज बहादुर सिस्टम में सुधार की गुंजाइश से निराश हुआ तभी उसने देश की सबसे बड़ी अदालत यानी जनता की अदालत में सोशल मीडिया के जरिए गुहार लगाई। हाँ, आवाज बुलंद करने वाले निर्भीक और ईमानदार मरते खपते तो जरूर हैं पर यदि वो हारते हैं तो ये हार उनकी ना होकर उन सबकी हार होती है जिनके लिए वो खप रहे होते हैं। शायद इसलिए यदि केंद्र सरकार के अलावा कोई हारा भी है तो वो है - बीएसएफ, सेना, देश और जनाब असल में जीता तो यकीनन कोई नहीं है।
 
यक़ीनन तेज बहादुर को सोशल मीडिया के जरिए ही पूरा देश जान पाया वरना बहुत से लोग गुमनाम ही सिस्टम से लड़ते रहते हैं और सिस्टम में बैठे आकाओं द्वारा मसल दिए जाते है और कोई जान भी नहीं पाता। 
 
तेज बहादुर को नमन। उसकी आवाज को नमन। लोकतंत्र को बचाने के लिए उसकी लड़ाई को नमन।


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