नजरिया

सुकमा नक्सली हमलाः चुनाव याद रहे लेकिन शहीदों को भूल गए हम

सुकमा नक्सली हमलाः चुनाव याद रहे लेकिन शहीदों को भूल गए हम

नर्इ दिल्ली।

पाँच राज्यों में हुए चुनावों के नतीजे आ चुके हैं। पांचों राज्यों के समस्त मतदाताओं  ने अपने लिए उपलब्ध सबसे बेहतर विकल्पों को चुना है। जनता बधाई की पात्र है। जीतने वाली सभी पार्टियों को शुभकामनाएं और हारने वालों के साथ मेरी संवेदना है। आपको यह बताना भी अत्यंत आवश्यक है कि छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सलियों से लड़ते हुए हमारे 11 साथी वीरगति को प्राप्त हुए हैं जो की 219 वीं बटालियन सीआरपीएफ के थे। 

 

देश की मीडिया तो क्या सोशल मीडिया में भी इसकी कोई चर्चा नहीं है और जब चर्चा ही नहीं है तो आक्रोश कहाँ से होगा? मैं गर्व से एवं अत्यन्त विश्वास से कहता हूँ कि हम एक अत्यंत संवेदनशील समाज में रहते हैं जहां बहुत छोटी बातों पर भी हमारी संवेदनाएं अक्सर आहत हो जाती हैं, लेकिन फिर सोचता हूँ कि देश के अंदर ही हमारे जवानों के ऊपर होने वाले कायराना हमलों पर देश की संवेदनाएं क्यों नहीं आहत होती?

 

इसके खिलाफ कोई जनाक्रोश व्यापक स्तर पर क्यों नहीं उभरता? वैसे संवेदना व्यक्त करने वाले कुछ औपचारिक बयान आएंगे या आए होंगे या आने ही वाले होंगे। लेकिन कल से सब सामान्य हो जाएगा (आज भी तो सामान्य ही है)। मैं अपने शहीद साथियों को भावभीनी श्रद्धांजली देता हूँ और परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि शोक शंतप्त परिवार  को इस मुश्किल घड़ी से निकलने की शक्ति दे। 

 

हम सभी को यह  अवश्य याद रखना चाहिए कि हमारे जवान देश की रक्षा के नाम पर महज औपचारिकता नहीं निभाते बल्कि अपनी जान देकर भी अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं।


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