नजरिया

सुकमा हमलाः सरकारों के पास नक्सलियों से निपटने के लिए सिर्फ बयानों का कॉपी पेस्ट, नीति नहीं

सुकमा हमलाः सरकारों के पास नक्सलियों से निपटने के लिए सिर्फ बयानों का कॉपी पेस्ट, नीति नहीं

 नई दिल्ली।

छत्तीसगढ़ के सुकमा में सीआरपीएफ जवानों की शहादत के बाद अब बयानों की बारी है। ऐसा लगता है कि जैसे हर कोई पुराने बयानों को कॉपी पेस्ट कर रहा है। जवानों की शहादत बेकार नहीं जाएगी, कड़े कदम उठाएंगे जैसे बयान नेताओं के पास इतने थोक में हैं कि जब जी चाहता है जहां जी चाहता है चिपका देते हैं फिर बात कश्मीर की हो या छत्तीसगढ़ की। नक्सल समस्या की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि देश के 10 राज्यों के 100 से भी ज्यादा जिलों में नक्सली सक्रिय हैं। 

छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का ये कोई पहला हमला नहीं है। इससे पहले भी बड़ी संख्या में जवान अपनी शहादत देते रहे हैं और नेता बयान। देश और आम आदमी की सुरक्षा के लिए जवान अपनी जान तक की बाजी लगाने की परवाह नहीं करते हैं तो नेता भी बयान देने में पीछे नहीं रहते। हां, सत्ता बदलती है तो बयान भी बदल जाते हैं। कल तो जो कांग्रेस नक्सली हमले से निपटने की बात करती थी वो आज केन्द्र की मोदी सरकार से जवाब मांग रही है। वहीं कल तक विपक्ष में रहकर कांग्रेस की नीतियों पर सवाल उठाने वाली भाजपा पिछले बयानों को दोहरा रही है। 

केन्द्र और राज्य में भाजपा की सरकार है। ऐसे में इस हमले को लेकर केन्द्र और राज्य सरकार सिर्फ बयानबाजी नहीं कर सकती हैं, लेकिन हमले पर हमले हो रहे हैं और सरकारें बड़े-बड़े बयान, निंदा और मीटिगों के आगे नहीं बढ़ पाती हैं। यहां तक की सरकारों के पास ऐसी कोई नीति ही नहीं है जो कि नक्सल प्रभावित इलाकों में सीआरपीएफ की तैनाती के आगे कुछ सोच सके। 

जंगल और जमीन को सरकार जिस तरह से अधिग्रहण कर रही है और उसके बाद एक गरीब शख्स से जिस तरह का व्यवहार किया जाता है उससे लोगों के पास भारत का आदर्श नागरिक बनने की अपेक्षा एक नक्सली बनना ज्यादा आसान लगता है। इन सबके बीच जो सबसे बड़ा सवाल उभर कर सामने आता है वो ये है कि इतने साधन होने के बावजूद हम हमेशा अपने जवानों की शहादत पर श्रद्धांजलि देते नजर आते हैं। आखिर क्यों हम इन हमलों से सबक नहीं लेते और कोई ठोस कार्रवाई नहीं करते? 

मजबूत हो सूचना तंत्र
जानकारों का मानना है कि सीआरपीएफ के जवानों की तैनाती लगभग पूरे देश में होती है। ऐसे में नक्सल प्रभावित इलाकों की उन्हें उतनी जानकारी नहीं होती है कि जितना स्थानीय स्तर का कोई व्यक्ति बता सकता है। स्थानीय लोगों से बातचीत और उनकी समस्याओं को जानने वालों के तौर पर जितना बेहतर काम एक आम आदमी कर सकता है उतना किसी और के लिए करना संभव नहीं है। ऐसे में सीआरपीएफ के साथ स्थानीय पुलिस का तालमेल बेहतर होना चाहिए। साथ ही इस क्षेत्र में नक्सलियों की गतिविधियों को पता लगाना भी टेढ़ा काम है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वे अपने सूचना तंत्र को और मजबूती दे। 

सेना की तैनाती
सीआरपीएफ के जवानों पर हमले के बाद अब नक्सल प्रभावित इलाके में सेना की तैनाती और एयरफोर्स की मदद लेने की बात की जा रही है। जानकार मानते हैं कि सेना को इस क्षेत्र में नक्सलियों के खिलाफ उतारना ठीक नहीं है। हालांकि आर्मी के जवानों की तैनाती कुछ स्थानों पर की जा सकती है, जिसके कारण नक्सलियों में एक तरह का खौफ जरूर पैदा होगा। पिछले कुछ सालों में नक्सलियों को बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है लेकिन अब भी वे पूरी तरह से खत्म नहीं हुए हैं। साथ ही ऐसे हमले उन्हें जीवनदान ही देते हैं।

सुकमा ही निशान पर क्यों? 
नक्सली हमलों की जब भी खबर आती है तो सबसे पहले नाम आता है सुकमा का। सुकमा में अब तक कई बड़े नक्सली हमले हो चुके हैं। ये गौर करने वाली बात है कि आखिर क्यों नक्सली सुकमा में हमलों को अंजाम देते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है सुकमा की भौगोलिक स्थिति। दरअसल, छत्तीसगढ़ का जिला सुकमा एक ओर उड़ीसा से जुड़ता है तो दूसरी ओर तेलंगाना से। नक्सली वारदात को अंजाम देकर निकल जाते हैं और दूसरे राज्यों में शरण लेते हैं। ऐसे में उनके पास कुछ दिनों तक चुप रहने और फिर दूसरी वारदात को अंजाम देने के लिए भी काफी वक्त होता है। वहीं राज्यों के बीच बेहतर तालमेल के अभाव के चलते नक्सली बच जाते हैं। 

समस्या का समाधान ढूंढने की नहीं की गई कोशिश
मनमोहन सिंह सरकार और मोदी सरकार के बीच यदि कोई अंतर नजर आता है तो वो ये कि पहले भाजपा सवाल उठाती थी और कांग्रेस बचने की कोशिश करती थी, लेकिन अब कांग्रेस सवाल उठाती है और बचाव की मुद्रा में बीजेपी है। दोनों ही सरकारों ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास के कामों को आगे बढ़ाया है लेकिन पुलिस और सुरक्षाबलों के साए में। दोनों ही सरकारों ने विकास और सुरक्षाबलों को तरजीह दी है। कोई शख्स नक्सली क्यों बन जाता है, इस सवाल का जवाब न पहले की सरकारों ने ढूंढने की कोशिश की और न ही ये सरकार ऐसी किसी बात को ढूंढने या समझने की कोशिश में है। 

सही बात ये है कि सरकारों के पास ऐसे हमलों के बाद बयानों का कॉपी पेस्ट होता है लेकिन नीति नहीं होती। जब तक हम बयानबाजी के जरिए लोगों को बरगलाने की कोशिश में खुद को बचाने की कोशिश करते रहेंगे तब तक इस समस्या से पार पाना संभव नहीं है। इसके लिए जिस ठोस नीति के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है वो भी सरकारों के पास नहीं है, ऐसे में नक्सलियों से निपटना मुश्किल है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इस हमले से सबक लेगी और इस दिशा में बयानों से अलग बेहतर ढंग से आगे बढ़ेगी। 


Tags:

  • Naxal attack,
  • chhattisgarh,
  • sukma,
  • Naxal attack in sukma,
  • jawan killed in naxal attack,
  • CRPF,
  • CRPF soldiers killed,
  • नक्सली हमला,
  • छत्तीसगढ़,
  • सुकमा,
  • सुकमा में नक्सली हमला,
  • जवान शहीद,
  • सीआरपीएफ जवान शहीद,

कमेंट