नजरिया

नजरियाः भविष्य की उम्मीद है गुरमेहर का ख्याल, जिसने हमें नफरत को जीतना सिखाया

नजरियाः भविष्य की उम्मीद है गुरमेहर का ख्याल, जिसने हमें नफरत को जीतना सिखाया

एक शहीद की बेटी हो या आम आदमी की बेटी। विचार किसी का भी हो और कुछ भी हो, नफरत से और गुंडागर्दी से दबाया नहीं जाना चाहिए।

गुरमेहर का लॉजिक एकदम सही है। नफरत हम सब में है, लोग सिर्फ उसे भड़काते हैं। बहुत हिम्मत चाहिए होती है खुद के अंदर के शैतान को मारने और उससे भी ज्यादा हिम्मत चाहिए अपने अन्दर के शैतान को स्वीकार करने में। लोगों में नफरत तो पहले से होती है बस कुछ लोग उस नफरत को हवा देने का काम करते हैं। हम नेताओं पर दंगों का ठीकरा फोड़ते हैं जबकि मूल भावना हमारे अंदर होती है जो हम दंगे करते हैं। दंगो के बदले दंगे भी उतने ही भयावह है जितने मूल दंगे।

भले यह सोच भाव वादी है पर मूल सच यही है कि हम भावनाओं से नियंत्रित होते हैं। नफरत और प्यार सब कुछ। कभी कभी लगता है कि हम सब ट्रोल हैं, गुरमेहर हममें से एक है वो हमारी अपनी है और इस भारत नाम के परिवार की सदस्य हैं। जब हम अपने बीच के व्यक्ति की मनोदशा समझने से इंकार कर उसको रेप की धमकी देंगे, उसको बेवकूफ घोषित करेंगे तो आप देशभक्ति का झंडा छोड़ दीजिए। मेरी चुनौती है उन सभी तथाकथित देशभक्तों से कि एक बार अपने दिल से पूछ कर देखें कि अगर कभी उनकी अपनी बेटी किसी से वैचारिक मतभेद रखे और कोई उसे इस तरह की गलीज धमकी दे तो कैसा महसूस होगा।

पिछले दो तीन दिन से देशभक्तों के समर्थन में कुछ महारथी भी खड़े हो गए हैं- वीरेंद्र सहवाग, योगेश्वर दत्त सरीखे। ये ऐसा क्यों कर रहे हैं ये तो वही जानें, लेकिन क्या इन्होंने ये सब कहने से पहले सोच कर देखा की देश, सीमाएं और युद्ध आज का सच बन चुका है और यह युद्ध इंसान द्वारा पोषित है। पाकिस्तान हम पर हमला करता है तो हम को बचाव करना ही पड़ेगा। आज हम कश्मीर छोड़ भी दंे तो कल वो हिमाचल में घुसेगा ही घुसेगा। हम अपनी गारंटी ले सकते हैं पर दूसरे की कैसे लें? ये सब सच है शायद ही इससे किसी को इनकार हो, लेकिन सोचिए यह सब शुरू भी किसी एक उन्मादी ख्याल से ही हुआ होगा, वही एक छोटा ख्याल जैसे गुरमेहर का प्यारा ख्याल है। आप उसको असंभव कहोगे, वैसे ही जैसे उसको कहा गया होगा जिसने सबसे पहले उड़ने की सोची होगी, लेकिन वो ख्याल आज साकार हो चुका है। यह प्राकृतिक सच है कि हम विध्वंस से जल्दी आकर्षित होते हैं, बजाय किसी रचना के या संरक्षण के। 

सोचने वाली बात यह भी है कि आपको प्यार और अमन का ख्याल महज यूटोपिया ही नहीं लगता बल्कि उसका मजाक उड़ाने व डराने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते। क्या यह डरावना नहीं है कि हमने युद्ध को सच की तरह स्वीकार कर लिया है। किसी का भी ये कहना कि इसके इतर कोई रास्ता नहीं। इसलिए अलग रास्ते की बात जरूरी है, उसको तो आप ही भजिया में तल देते हैं। फिर कैसे निकलेगा रास्ता ?

जब आप कोई रास्ता ही नही निकालना चाहते तो वो सारी कहानियों को हटा दीजिये जो बुद्ध और अंगुलिमाल की बात करती हैं, जो बाबा भारती का सबक सिखाती हैं, ज़िन कहानियों ने हमंे वाल्मीकि का ऋषित्व प्राप्त करने की कथा सुनाई, क्यों ना उन्हें सिर्फ कॉमिक कहानियों का संग्रह मान सिरे से खारिज कर दिया जाए। हम महाभारत के युद्ध की बात करते हैं तो हमें कृष्ण के कटुवचन भी याद करने होंगे जो उन्होंने पांडवों और द्रुपद को कहे थे। 

एक लड़की जिसने अपने पिता को खोया वो बदले की नहीं बल्कि ऐसे किसी रास्ते की बात करती है या ऐसा कोई रास्ता तलाशना चाहती है जहां उस जैसे और बच्चों को अनाथ न होना पड़े। यकीनन यह ख्याल फेसबुक चटकाने से करोड़ांे गुना ज्यादा एफर्ट मांगता है, लेकिन हम सरल वाला चुनते हैं, गाली दो धमकाओ और फेसबुक पर देशभक्ति झाड़ो और आगे चलो। अब गहराई से सोचने का वक्त है और आज यह यूटोपिक लगता है पर यह यूटोपिक ख्याल ही उम्मीद है बेहतर कल की और इसलिए गुरमेहर को एक सेल्यूट। इसलिए की उसने नफरत को जीता और आपके और मेरे मुंह पर एक तमाचा लगाया हमें जगाने के लिए।

एक ख्याल पहली सीढ़ी होता है कुछ भी बदल देने की, आप चुन सकते हैं कि आप किस ओर होना चाहते हैं, लेकिन कुचलने की प्रवृत्ति पर रोक लगनी ही चाहिए। वरना समय के पहिए में एक दिन नंबर सब का आता है।

लेखकः नरेश गुप्ता।


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