नजरिया

योगी राज के विरोधियों का सोशल मीडिया की लफ्फाजी से काम नहीं चलेगा

योगी राज के विरोधियों का सोशल मीडिया की लफ्फाजी से काम नहीं चलेगा

नई दिल्ली। 

पांच राज्यों के चुनावों में सबसे ज्यादा नजरें टिकी थीं उत्तर प्रदेश पर। जहां पर भाजपा के फायर ब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ शपथ ले चुके हैं। अब यदि किसी को यह लगता है कि भारी बहुमत ईवीएम की करामात है तो उतरिए सड़क पर और बचाइए लोकतंत्र को, बचाइए अपनी आने वाली पीढ़ियों को, खाइए लाठियां, जाइए जेल, करिए अपना सीना पुलिस की बंदूक से निकलने वाली गोली के सामने, लेकिन हम तो ठहरे फेसबुक व व्हाट्सएप्प से दुनिया चलाने वाले। हमारी पहली प्राथमिकता देश बचाने की हो या ना हो लेकिन पहली प्राथमिकता ये जरूर है कि हम तो फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर चिल्ल पौं करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लें और देश बचाने के लिए भगत और आजाद हों पड़ोसी के घरों के लेकिन जनाब इस से दुनिया नहीं चलती है। फेसबुक व व्हाट्सएप्प में मैसेजों को कॉपी-फारवर्ड करके तो एक समय की रोटी नहीं कमा सकते और दुनिया बदलने का ख्वाब देखते हैं।

वोट फेसबुक व व्हाट्सएप्प की लफ्फाजी से नहीं मिलता। वोट जमीन पर उतर कर अपने नेता के लिए मेहनत करने से मिलता है। वोट जब रोड-शो करने से नहीं मिलता तो फेसबुक व व्हाट्सएप्प में मैसेज फारवर्ड करने से कैसे मिल सकता है? अब या तो यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि संघ व भाजपा के कार्यकर्ता जमीन से लेकर सोशल मीडिया में हर स्तर पर आपसे बेहतर हैं, या यदि आप यह मानते हैं कि ईवीएम के कारण भाजपा को बहुमत मिला, तो फिर सिर्फ गला मत फाड़िए और देर मत कीजिए उतरिए सड़कों पर, संघर्ष कीजिए क्योंकि सिर्फ लफ्फाजी से बिलकुल भी काम नहीं चलेगा, लेकिन सड़क पर उतर कर संघर्ष करना हर किसी के बूते की बात नहीं। कभी जमीन पर उतर कर समाज के लिए काम व संघर्ष किया हो तो ही कुछ हिम्मत पड़ सकती है, देश के लिए सड़क पर उतर कर संघर्ष करने की।

बात बुरी लगे या भली, यह आपकी अपनी सोच का स्तर हो सकता है, लेकिन अब ये स्वीकार करने में कतई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए की उत्तर प्रदेश में मायावती जी के दिन लद गए, मायावती जी के दिन लदने का मतलब बसपा के दिन लद गए, लेकिन इसमें भावुक होने से कुछ नहीं होने वाला, ये कड़वा सच है। ईवीएम होती या न होती, मायावती जी की हालत कम-अधिक यही होती जो हुई है और जहाँ तक बात है अखिलेश जी की तो उनको वास्तविक जमीन पर उतरना पड़ेगा, एक आम जमीनी नेता की तरह खुद को पूरी ताकत के साथ यादवों के अतिरिक्त अन्य पिछड़ी जातियों के मान्य व लोकप्रिय नेता के तौर पर स्थापित व साबित करना होगा। इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं। यही परीक्षा है अखिलेश जी की, उनकी राजनैतिक सूझबूझ, सांगठनिक क्षमता व दूरदर्शिता की।

जहाँ तक भाजपा व संघ को समझने की बात है तो उसके आधार पर योगी आदित्यनाथ जी को मोदी जी के बाद भाजपा के भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख जा सकता है। मोदी जी शायद कुल दो टर्म तक प्रधानमंत्री रहेंगे, उसके बाद योगी आदित्यनाथ या इन्हीं सरीखा कोई अन्य नेता प्रधानमंत्री के रूप में अपनी पारी खेलने को पैड बांधे तैयार दिखाई देगा।

मोदी जी गुजरात दंगों के लिए बदनाम हुए लेकिन पूरे देश में खुद को विकास पुरुष के रूप में स्थापित कर लिया। योगी जी के खाते में गुजरात दंगों जैसा कुछ है भी नहीं तब क्या योगी जी खुद को विकास पुरुष व शांत पुरुष के रूप में स्थापित नहीं कर पाएंगें? और इसकी शुरुआत हो भी चुकी है इसी फेसबुक और व्हाट्सएप्प के जरिए, क्या मुश्किल है। योगी आदित्यनाथ जी के
राजनैतिक पैतरों वाले बयानों में मिट्टी डालकर भूल जाने का निवेदन करने में? और क्या मुश्किल है किसी को अपने आप में इम्प्रोवाइज कर लेने में?

केंद्र सरकार उनकी, राज्य में भारी बहुमत के साथ हैं। जितने मर्जी उतने राजमार्ग बनवा कर एयरोप्लेन उतरवा कर विकास पुरुष बन जाएंगें। यदि एक प्रतिशत भी मान लीजिए कि योगी जी ने संतुलन के साथ काम किया तो कैसे रोक पाएंगें आप उनको? इस बार न रोक पाए तो अगली बार कैसे रोक लेंगें?

लोगों को लगा कि भाजपा अखिलेश जी से बेहतर काम करेगी, इसलिए भाजपा को अवसर दिया। यदि योगी जी बेहतर काम करते हैं तो अखिलेश जी को और अधिक बेहतर कामों के विचारों के साथ लोगों को लुभाना पड़ेगा। यही लोकतंत्र में आदर्श चुनाव की रूपरेखा होनी चाहिए। सब भूल कर ये प्रार्थना करें की योगी आदित्यनाथ जी अच्छा काम करें, ताकि उनके विपक्ष को और अधिक अच्छे कामों की मंशा के साथ आगे आना पड़े। यही एक बेहतर राजनीति की शुरुआत होगी। यही बदलाव होगा। काम करने की प्रतिस्पर्धा वाली राजनीति से डर किस बात का? यदि ऐसा हो पाया तो यह तो भारत की राजनीति में बहुत ही अधिक बेहतर युग की शुरूआत होगी।

लोग 2012 से मोदी का विरोध करते आ रहे हैं, क्या बिगाड़ लिया? 2014 में भारी बहुमत से केंद्र में सरकार बनाई। विरोध और अधिक मुखर होने लगा, उन्होंने नोटबंदी लागू कर दी, विरोधियों को लगा की रसगुल्ला आ गया मुंह में और विरोध अपने चरम पर पहुँच गया, लेकिन क्या आप अपनी बात और अपने विचार जनता के बीच पहुंचा पाए ? तो सिर्फ विरोध भर करने से कुछ नहीं
होगा।

ये विरोध सिर्फ हवाई है, ये विरोध सिर्फ दिखावटी है, ये विरोध सिर्फ बनावटी है, ये विरोध कर्महीन है। आप लोगों के बीच नहीं जाते, आप जमीन पर नहीं जाते हैं, आप तर्क गढ़ते हैं जमीन पर न जाने के तो परिणाम इस से इतर  हो भी नहीं सकता। आपने जितना विरोध किया मोदी उतने ही ताकतवर बनते गए, उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से सरकार बन गयी है और वोटों के प्रतिशत के हिसाब से ही सही लगभग पूरा देश उनके साथ है।

अब या तो विरोध को सही माने में विरोध बनने दें। महात्मा गाँधी का सिर्फ नाम ना भजें उनसे विरोध के तरीके सीखें। सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाएं। जेल भरें, लाठियां खाएं और या फिर मोदी को और योगी तो मौका दें, अगर वो नाकाम रहें तो आवाज उठाएं अगले चुनाव में। 

अगर हम यह सोच कर चल रहे हैं कि हम सड़क पर नहीं उतरेंगें, संघर्ष नहीं करेंगे। तब भी सत्ता अपने आप रसगुल्ले की तरह हमारे मुंह में आ गिरेगी तो हम शेखचिल्ली हैं। यदि आप ईवीएम को गलत मानते हैं तब भी और ईवीएम को गलत नहीं मानते हैं तब भी। दोनों ही सूरत में विरोध करने वालों को जमीन पर उतरकर संघर्ष करना होगा। नए तौर तरीकों के साथ सवाल यह है कि क्या हम ऐसा कर पाएंगें?

बैठे ठाले राजनीति करने व सत्ता पाने के दिन लद गए, दूसरे दल की गलतियों से फिर सत्ता पाने के दिन भी लड़ गए क्योंकि तब कोई तीसरा कोण कहीं से अरविन्द केजरीवाल बन कर कब आपके सपने चुरा ले जाएगा पता ही नहीं चलेगा, इसलिए बेहतर हो कि इस बात को जितनी जल्दी हो सके स्वीकार कर लें की आपको संघर्ष करना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी। चाहे ईवीएम हो या ईवीएम न हो।

 

लेखक-नरेश गुप्ता


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