नजरिया

बीफ का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है भारत, क्या सरकारी मदद के बिना ऐसा संभव है?

बीफ का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है भारत, क्या सरकारी मदद के बिना ऐसा संभव है?


नरेश गुप्ता। 

गाय या किसी जानवर को मारना सही नही है, पर उसके लिए ऐसे भय का माहौल खड़ा करने से गाय का ही नुकसान है। राह गलत चुन लें तो मंजिल भटक जाती है, इस आर्थिक और सामाजिक भूमंडलीकरण के दौर में बचा वही रहेगा जो अपनी प्रासंगिकता आर्थिक तौर पर सिद्ध करेगा। उसके बचे रहने के लिए प्रासंगिक होना जरुरी है और गाय सामाजिक जीवन में अप्रासंगिक हो रही है। गाय को मारने से बचाना जरुरी है पर उससे ज्यादा जरुरी है उसको आर्थिक और सामाजिक रूप से उपयोगी बनाना, आज भारत में गाय दूध देने के मामले में अपनी उपयोगिता लगभग खोती जा रही है कम से कम गंवई संस्कृति में। गोबर का उपयोग जलावन के लिए या खाद के लिए ख़त्म हो गया है और वैसे गोबर तो भैंस भी देती है। गाय की जगह भैंस ने ले ली है, अगर आपको गाय को बचाना है तो उसकी नस्ल परिष्कृत कर दूध के लिए उपयोगी बनाना ही होगा, उच्च दुग्ध गुणवत्ता वाले नस्लों से इनका संकरण पोलियो अभियान वाले पैमाने पर करवाना होगा। ऐसा कुछ होता न सरकारी स्तर पर और न सामजिक स्तर पर होता हुआ प्रतीत नहीं होता है और ना ही वर्तमान में उग्र विकसित हुए गौरक्षक दलों या उनके राजनीतिक आकाओं में ये सब करने की ना इमानदारी है और ना ही जरूरत।

निश्चित रूप से भारतीय देशी गाय का दूध, परिष्कृत गायों के दूध के मुकाबले अति उच्च कोटि का है, पर सिंथेटिक दूध पीने के इस दौर में क्वालिटी की अपेक्षा करने वाले समाज की कल्पना ही नहीं की जा सकती। एक जाने-माने उद्योगपति श्री सुरेश बंसल अक्सर अपनी पीड़ा इन शब्दों में व्यक्त करते हैं कि देशी नस्ल की गायों का दूध आने वाले दौर में बस दवाओं के रूप में ही काम आएगा और उतनी ही मात्रा में उपलब्ध रहेगा, जैसे जड़ी बूटियाँ उपजाई जाती है। कहने को ये एक साधारण से बात है लेकिन गहराई से सोचें तो इस बात में कोई अतिश्योक्ति नहीं है।

अगर हम गाय की ढुलाई आदि पर प्रतिबन्ध लगा देंगे या गौरक्षक गुंडा फौज को मनमानी करने देंगे या लाइसेंस जैसी जटिल प्रक्रिया ले आएंगे तो किसान के लिए इसकी बची खुची प्रासंगिकता भी खत्म हो जाएगी। गाय उनके लिए और महंगी हो जाएगी, वैसे भी गाय का रखरखाव भैंस की तुलना में ज्यादा मुश्किल है गाय ज्यादा सुकुमार जीव है।

प्रासंगिकता की बात को हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं कि भेड़िये इसलिए खत्म हो गए क्योंकि वो मानव के लिए खुद को प्रासंगिक नहीं बना पाए, जबकि उसी की नस्ल के कुत्ते इस मामले में समझदार निकले और आज मानव बस्ती बसने के साथ ही वहां पर कुत्तों का वास लगभग सुनिश्चित सा हो जाता है।

सबसे डरावना पहलू ये है कि इस गौ बचाओ अभियान में भी नैतिकता की कमी है। वर्तमान में भारत की सबसे बड़ी गौकशीखानों और एक्सपोर्ट कंपनियों में से 75 फीसदी हिंदुओं और जैनियों की हैं और इनके राजनीतिक आका उन्हीं दलों से सम्बंधित हैं जिनके नाम पर फर्जी गौरक्षक गुंडागर्दी के उफान पर है और सभी जिम्मेदार मौन हैं। ये सभी कम्पनियां भारत सरकार से लाइसेंस प्राप्त है। 

हमारा भारत आपका भारत सबका भारत, पूरे विश्व में दूसरा सबसे बड़ा बीफ निर्यातक है और सब सरकारी प्रोत्साहन से। यहाँ पिछले 70 सालों की कहानी भी नहीं चल सकती क्योंकि अगर हम इतने ही ईमानदार हैं तो 3 वर्ष का समय काफी होता है ऐसी कम्पनियों को हतोत्साहित करने के लिए। यानी वर्तमान सरकार भी रजामंद है? कितना बड़ा विरोधाभास है, यही विरोधाभास सारे झगड़े की जड़ है। 

गौ सहित सभी जानवरों का रसास्वादन भर के लिए मारने पर निश्चय ही रोक लगे, लेकिन उसे अन्यत्र उपयोगी बनाए बगैर उसका बचना मुश्किल है, अगर स्वयं घोषित गौरक्षक उसे बचा भी लेंगे तो उसे भूख और प्यास खत्म कर देगी। प्रकृति ही ख़त्म कर देगी। 

विडंबना तो ये है जनाब की लोग तो घर खर्च में योगदान देने में अप्रासंगिक हो चुके माता पिता को त्याग देते हैं। ये तो फिर भी चौपाया है। ऐसा एक मॉडल खड़ा करने का मन है, आप के आइडियाज़ का स्वागत है।


Tags:

  • beef,
  • beef exporter india,
  • gaurakshak,
  • cow slaughter,
  • intolerance,
  • गाय,
  • बीफ,
  • बीफ निर्यातक भारत,
  • India on top in exporting beef,
  • असहिष्णुता,
  • गौरक्षक,
  • ,

कमेंट