नजरिया

खफा हो सकते हैं लेकिन किसी की जान ही ले लें धर्म एेसा तो नहीं कहता

खफा हो सकते हैं लेकिन किसी की जान ही ले लें धर्म एेसा तो नहीं कहता

नई दिल्ली। 

मैं गर्म हवाआें के थपेड़ों से परेशान हूं, आप में से कोर्इ एेसा भी होगा जो ठंडी हवाआें को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। किसी को अपने दरवाजे पर कूड़ा फेंका जाना पसंद नहीं हैं तो कोर्इ घर पर पानी न आने से खफा है। दुनिया में हर आदमी खफा है, हर आदमी परेशान है। मैं गुस्से में हूं आप गुस्से में हैं। ये दुनिया है जहां हर कोर्इ कुछ कर गुजरने की हसरत पाले है। 

गुस्से में हमारी हालत दूसरों से अलग नहीं है। हम भरे बैठे हैं, गुस्से से, बस एक बहाना चाहिए कत्ल करने का। किस पर अपना हाथ साफ करें। खून में उबाल आ ही गया है तो उसे कैसे ठंडा करें? किसे कुछ ही क्षणों में लाश बना दें? हर कोर्इ आदमी यहां एेसा ही है। इस मायने में भारत आैर पाकिस्तान की एक दूसरे से तगड़ी 'यारी' लगती है। सीमा पर दोनों झगड़ते रहते हैं, लेकिन सीमाआें के अंदर दोनों एक जैसे मासूम होते हैं। ताजा हाल दो मामलों से सामने आता है। इनमें से एक पाकिस्तान के मशाल की मौत से जुड़ा है तो दूसरा भारत के पहलू खान की मौत से। 

23 साल का मशाल अब्दुल वली खान विश्वविद्यालय का पत्रकारिता का छात्र था। मशाल पर र्इश निंदा का आरोप लगाया गया आैर दूसरी मंजिस पर स्थित उसके कमरे से उसे निकाला गया आैर निर्वस्त्र कर मारपीट की गर्इ। इसके बाद उसे गोली मार दी गर्इ आैर फिर नीचे फेंक दिया गया। इसके बाद भी जब मशाल की मौत न हुर्इ तो उसे भीड़ ने उसे मारा आैर तब तक मारते रहे जब तक की जान ने जिस्म को अलविदा न कह दिया। एेसा ही मामला भारत का भी है। जहां 55 साल के पहलू खान को गायों की तस्करी के आरोप में लोग इतना मारते हैं कि उनकी मौत हो जाती है।

दोनों घटनाएं अप्रैल की है आैर दोनों बताती हैं कि ये दो देश भले ही अलग हो गए हों लेकिन अब भी दोनों जगहों पर दिल छोटे आैर बहुत छोटे हैं। धर्म के नाम पर हम इतने ज्यादा आक्रामक हो उठते हैं कि किसी की जान छोटी हो जाती है। मशाल की मौत आैर पहलू खान की मौत एेसे ही उदाहरण हैं। 

र्इश निंदा का आरोप लगाकर पाकिस्तान में 1990 से अब तक 65 लोगों की हत्या की गर्इ है। मशाल के अध्यापक कहते हैं कि वह होशियार था, सवाल उठाता था, मामले की तह तक जाता था, हमने नहीं सुना उसने कभी र्इश निंदा जैसी बात कही हो लेकिन उसे राजनीति से जरूर शिकायत थी। मशाल ने र्इश निंदा की या नहीं, सवाल ये नहीं है। सवाल ये है कि यदि कोर्इ शख्स र्इशनिंदा करता है, र्इश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाता है तो क्या बिना किसी सुनवार्इ के उसे मार देना ठीक है। सभ्यता आैर संस्कृति की बात करने वाले, खुद को पढ़ा-लिखा कहने वाले लोगों की नजरों में भी यदि हत्या को लेकर कोर्इ दुख न झलकता हो तो समझिए न इंसानियत सही दिशा में है आैर न ही वो देश। गौर करने वाली बात ये है कि मशाल को मार देने वालों में तबका पढ़ा-लिखा था, छात्र वर्ग से था। 

भारत में गाय को लेकर इन दिनों जो उग्रता है वैसी संभवतः कभी नहीं रही। गाय को पूजने की हमारी संस्कृति बरसों से है। लेकिन किसी को गो तस्कर के सिर्फ शक में मार देना कानून का पालन करने वाले हर भारतीय के लिए शर्मनाक है। 55 साल का एक आदमी जिसकी दाढी रंगी है आैर जो गायों को ले जा रहा है। एेसे आदमी को दो सौ से ढार्इ सौ लोग घेरकर पीटना शुरू कर दें ये कहां की बहादुरी है। हम जैसे लोग खुद को दूसरों से बेहतर बनाने की कोशिश में जिंदगी भर कोशिश करते हैं, लेकिन एक बूढ़े आदमी को सिर्फ शक में मारकर हम स्वयं के सभ्य होने की बात कह भी कैसे सकते हैं। यदि कोर्इ शख्स कानून सम्मत आचरण नहीं करता आैर कानून का अपमान करता है तो उसे सजा देने का अधिकार कानून के पास सुरक्षित रहने देना चाहिए। हालांकि एेसे मामलों में हम स्वयं न्यायाधीश बन जाते हैं जो गलत है। 

भारत आैर पाकिस्तान अलग-अलग देश जरूर बन गए हैं, लेकिन हमारे दिलों में चीजें वही पुरानी हैं जो हमें हर बार पीछे खींचती है। युद्घ आैर परमाणु बमों की बात करने वाले दोनों देशों में एक जैसे ये दो मामले बताते हैं कि हमारे यहां जिंदगी सस्ती है आैर अपना अहम ज्यादा बड़ा है। धर्म इंसानों के लिए है लेकिन हमने ये समझा कि इंसान, धर्म के लिए है जिन्हें जब चाहा धर्म के नाम पर कुर्बान किया जा सकता है। मशाल आैर पहलू खान की मौत यदि अापको नहीं झकझोरती तो समझिए आप एेसे लोगों को बढ़ावा दे रहे हैं जो एक न एक दिन अापकी जिंदगी को भी लील सकते हैं। एेसा लगता है कि जैसे हर कोर्इ गुस्से में है आैर कत्ल करने के लिए तैयार बैठा है। 


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