नजरिया

अपनी-अपनी देशभक्ति, अपना-अपना बाजार, खो गई संवेदनाएं, मर गए भाव

अपनी-अपनी देशभक्ति, अपना-अपना बाजार, खो गई संवेदनाएं, मर गए भाव


नरेश गुप्ता/नई दिल्ली।

जब बाजारवाद हावी होता है तो सारी संवेदनाएं, सारे भाव कहीं खो जाते हैं और रह जाते हैं तो सिर्फ वर्गों में बंटे उपभोक्ता।
इस बाजारवाद ने क्या-क्या नहीं बांटा?

सैकड़ों सालों की विदेशी आक्रांताओं से मिली गुलामी की पीड़ा को झेलते देश में कुछ सरफिरे उठे, कफन बाँधा और चल पड़े देश को आज़ाद कराने। छोटे-छोटे राज्यों में बंटे देश को एकजुट करने को देश के लिए भक्ति यानी देशभक्ति का पाठ पढाया। इतना आसान नहीं था देश भक्ति का पाठ पढाना। जान की आहुतियां तक दी दीवानों ने, अपने सपने भूले और देश के लिए सपना देखा और दिखाया। एक अलग नजरिया सिखाया तब कही जा कर देश और उसके लिए भक्ति का जज्बा लोगों में आया। उस वक्त की देश भक्ति एक थी, ना वो तेरी थी ना वो मेरी थी, वो सबकी थी। चाहे वो मुसलमान हो, या हिन्दू हो या सिख या बुद्धिष्ट कोई भी, सबके लिए देश भक्ति एक थी। 

आज देश भक्ति का मन बहुत दुखता होगा। अब ये तेरी-मेरी, उसकी-इसकी जो करार दे दी गई है। आखिरकार देशभक्ति को भी बांट दिया गया है। 

तेरी देश भक्ति अलग, मेरी अलग, इसकी अलग तो उसकी बिलकुल अलहदा।  
मेरी देशभक्ति तो पंद्रह अगस्त पर भूरे लिफाफे में बंद बूंदी के लड्डू हैं........तुम्हारी क्या है..?
मेरी देशभक्ति तो मेरी चोटी में बंधा हरा रिबन है.....तुम्हारी क्या है..?
मेरी देश भक्ति तो प्रेम है तुम्हारी क्या है?
मेरी देश भक्ति देश को जोड़ने में है तुम्हारी क्या है?
मेरी देश भक्ति तो अहिंसा है .. तुम्हारी क्या है?
मेरी देश भक्ति भारत माता की जय है तुम्हारी क्या है???
मेरी देश भक्ति केसरिया है तुम्हारी क्या है?
मेरी देश भक्ति एंटी-रोमियो है तुम्हारी क्या है?
मेरी देश भक्ति राष्ट्र गान पर डंडे से खड़ा करना है तुम्हारी क्या है?
मेरी देश भक्ति गोकशी रोकना है तुम्हारी क्या है???

ऐसे अनेक सवाल हैं और ऐसी अने देश भक्तियां हैं। अनेक वर्ग हैं और अनेक देश भक्तियां हैं। 

क्या ये बंटी हुई देश भक्ति देश के लिए है? या अपनी-अपनी दुकानें चलाने के लिए बाजार द्वारा बांट दी गई है? दुकानें... यानी दल..... यानी राजनीतिक दल...... यानी कार्यकर्ताओं की फौजें।

अगर कहीं अविभाजित देश भक्ति दिखाई दें तो मुझे सूचित जरूर करें....... कुछ कर्ज चुकाने है।


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