नजरिया

हे राम! आपके मंदिर में भाजपा को वोट नजर नहीं आते, न मुद्दा छोड़ते बनता है न पकड़ते

हे राम! आपके मंदिर में भाजपा को वोट नजर नहीं आते, न मुद्दा छोड़ते बनता है न पकड़ते

लखनऊ। 
भारतीय जनता पार्टी ने उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अपना घोषणापत्र जारी कर दिया है। भाजपा ने इसे नाम दिया है, ‘लोक कल्याण संकल्प पत्र 2017‘। इंटरनेट पर मौजूद इस 32 पृष्ठों के घोषणापत्र में 25वें पेज पर दो लाइने हैं। जहां पर भाजपा ने राम मंदिर बनाने का संकल्प दोहराया है। 

पार्टी ने सांस्कृतिक विरासत में लिखा है, ‘राम मंदिर पर भाजपा अपना रुख दोहराती है- संविधान के दायरे में अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए सभी संभावनाओं को तलाशा जाएगा।‘ राम मंदिर और भगवान राम का नाम इस पूरे घोषणापत्र में बस यहीं आया है। एक दो मौकों पर अयोध्या का नाम अलग-अलग जगह पर है, लेकिन उसका संदर्भ राम मंदिर से काफी अलग है। 

एक जमाना था जब राममंदिर आंदोलन की राजनीतिक अगुवाई भाजपा ने की थी। लालकृष्ण आडवाणी रथ लेकर निकले थे। भाजपा आज जो भी है उसी राम मंदिर की देन है जिसके नाम पर राजनीति तो बहुत हुई लेकिन जब भी राम मंदिर बनाने की बात आती है भाजपा कोर्ट या संविधान का नाम लेकर पतली गली से बच निकलने का प्रयास करती है। 

नेताओं का बयानों से मुकर जाना आम है, लेकिन जिस मुद्दे को भुनाकर भाजपा ने सत्ता की चौखट चूमी उसी मुद्दे की इतनी दुर्गति शायद ही किसी पार्टी ने की हो। राम मंदिर को लेकर आगे बढ़ने वाली भाजपा को अब शायद ‘राम‘ नाम पर वोट का विश्वास नहीं है या फिर पार्टी समझ चुकी है लोगों को बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। राम मंदिर का मुद्दा पार्टी के सबसे प्रमुख मुद्दों में से एक रहा है इसलिए न इस मुद्दे को छोड़ते बन रहा है और न ही साथ रखते। यही कारण है कि पार्टी राम मंदिर की बात तो करती है लेकिन बहुत सुस्त अंदाज में। 

उत्तर प्रदेश में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने भाजपा प्रदेशाध्यक्ष की कुर्सी संभालने के बाद कहा था कि भाजपा विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी लेकिन हाल ही में उन्होंने विवादित राममंदिर के मुद्दे को तूल देने की फिर से कोशिश की है। मौर्य ने कहा है कि भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनती है तो अयोध्या में भव्य राममंदिर का निर्माण किया जाएगा। सवाल ये है कि जब केन्द्र में मोदी सरकार के पास पूर्ण बहुमत है तो अब मौर्य किस बात का इंतजार कर रहे हैं। मौर्य का ये कहना बताता है कि राममंदिर को लेकर पार्टी के अंदर ही कंफ्यूजन जैसी स्थिति है। पार्टी को समझ ही नहीं आ रहा है कि वो क्या करे। 

ऐसी स्थिति में पार्टी की कोशिश इस मुद्दे को चमकाने की भी है तो भूल जाने की भी। ये मुद्दा लेकर पार्टी ने देश भर में जो जबरदस्त शोर मचाया था। ऐसे में यदि पार्टी राम मंदिर के मुद्दे को अलग रखकर चुनाव मैदान में उतरती तो उसे लेकर पार्टी की जमकर किरकिरी होती। साथ ही जो लोग पीएम मोदी को ‘हिंदू हृदय सम्राट‘ जैसे संबोधनों से पुकारते रहे हैं, वो भी पार्टी से जुड़कर खुद को ठगा हुआ सा महसूस करते। ऐसे में पार्टी ने राममंदिर के मुद्दे को जिंदा तो रखा है लेकिन वेंटिलेटर पर। जिसे अपनी सुविधा के अनुसार कभी भी ऑफ किया जा सके। यदि इस बार भी मतदाताओं पर राममंदिर का चश्मा चढ़ाने में भाजपा कामयाब नहीं हुई तो हो सकता है कि ये मुद्दा हमेशा-हमेशा के लिए घोषणापत्रों से भी निकल जाए। 

भाजपा को राममंदिर में वोट नजर नहीं आते, लेकिन इस मुद्दे को गर्म रखकर मिलने वाले वोटों से सत्ता का सहारा ढूंढ रही है, लेकिन असलियत में भाजपा को राम मंदिर में वोट मिलते नजर नहीं आ रहे हैं। 


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