नजरिया

भगत सिंह हम शर्मिंदा हैं क्योंकि हम आपको मरने दे रहे हैं और वो भी आसानी से

भगत सिंह हम शर्मिंदा हैं क्योंकि हम आपको मरने दे रहे हैं और वो भी आसानी से

 

बहुत साल पहले जब बहुत छोटे थे शायद दूसरी-तीसरी कक्षा की बात होगी उस वक्त ‘नन्दन’ में भगत सिंह के ऊपर चित्रकथा छपी थी, उस के आगे पीछे की घटनाओं व हम उम्र भाई बहनों में हुई चर्चाओं व कुछ बड़ों की समझाइश के साथ तब मैं बहुत प्रभावित हुआ था, और साथ ही साथ बहुत जोश भी भर गया था। कुछ दुःख भी हुआ था कि अब भगत सिंह जैसे लोग हमारे बीच नहीं रहे, तब घर के बड़ों ने समझाया था कि दुखी नहीं होना है बल्कि उन पर गर्व करना है और उनके जैसे ही देश से प्यार करना है। आज के समाज में देखता हूँ तो शर्मिंदगी होती है कि माँ बाप बच्चों को शहीद दिवस के बारे में क्या और कितना बता पाते हैं। क्या देश आजाद है तो देश से प्यार नहीं होना चाहिए?

हमें देश से प्यार करने का मतलब समझाया गया था कि एक अच्छे बच्चे बन कर ही हम वो कर सकते हैं जो भगत सिंह इत्यादि चाहते थे। धार्मिक तौर पर लगभग अंधविश्वासी होते हुए भी सभी धर्मों का आदर करना सिखाया, आपस में प्रेम और सहअस्तित्व की भावना से रहना सिखाया, भाई चारा आदि शब्दों से ताल्लुक कराया था ... और आज ? क्या ये सब चर्चाएँ घरों में होती हैं?

ये बात बताने का तात्पर्य ये है कि अच्छा बनना जिसे हम सब ने बचपन में बहुत आसान समझा था, क्या सच में अच्छे बनें या क्या योगदान है हमारा ? 

असल में 1931 में आज ही के दिन भगत सिंह फांसी के फंदे पर झूल गए थे बल्कि ज़िन्दा हुए थे, उनके विचार युवाओं में जागृत हुए ....पर 1947 से ले कर आज तक हम उन्हें रोज मार रहे हैं जब भी छद्म राष्ट्रवादी उनका नाम ले कर विलाप करते हैं वो मरते हैं और तब भी भगत सिंह मरते हैं जब साम्राज्यवाद के कारण जमीनें छीन ली जाती हैं और किसान आत्महत्या करता है, तब वो घिसट के मरते हैं जब आदिवासियों को नक्सली बना के मार दिया जाता है, जब अच्छे दिनों में भी एक एक दर्द भरी चीख घुट के रह जाती है। सबसे स्याह पहलू ये है कि हम शहीद भगत सिंह को मरने दे रहे हैं और वो भी आसानी से।

बचपन में मैं शर्मिंदा हुआ था क्योंकिं मैं भगत सिंह को बचाने के लिए मौजूद नहीं था, क्यों भगत सिंह हमारे बीच जिन्दा नहीं थे। आज मैं शर्मिंदा हूँ फिर से... कैसे रोज़ भगत सिंह दम तोड़ देते हैं ??? कैसे भगत सिंह सिसकते हैं रोजाना?? कैसे भगत सिंह की आँखे सवाल पूछती हैं मुझसे ... क्या इसीलिए हमने बलिदान दिए थे??? शर्मिंदा हूँ मैं बस शर्मिंदा हूं.....।

लेखक- नरेश गुप्ता


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