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नाम है सद्दाम इसलिए नहीं मिल रहा मुकाम, नौकरी के लिए 6 महीनों में 40 बार रिजेक्ट

नाम है सद्दाम इसलिए नहीं मिल रहा मुकाम, नौकरी के लिए 6 महीनों में 40 बार रिजेक्ट

नई दिल्ली। 

नौकरी पाने के लिए क्या जरूरी है? अच्छे अंक, योग्यता, उम्र या फिर नाम। आप सोच रहे होंगे कि नौकरी पाने में नाम की क्या भूमिका हो सकती है तो हम आपको बताते हैं कि कैसे नाम ने एक युवा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। ये शख्स हैं जमशेदपुर में रहने वाले सद्दाम हुसैन। सद्दाम तमिलनाडु की नुरुल इस्लाम यूनिवर्सिटी से पास आउट हैं। वे 2014 में मरीन इंजीनियर बने लेकिन अपनी क्लास में सेकेंड और फर्स्ट डिविजन से पास होने के बावजूद भी उन्हें नौकरी नहीं मिली। 

सद्दाम को अपने नाम की वजह से किसी ने नौकरी देना मुनासिब नहीं समझा। कई कोशिशों के बाद भी उनका नौकरी करने का सपना, सपना ही रह गया। इसके बाद उन्होंने कंपनियों के एचआर डिपार्टमेंट से इस बारे में बातचीत की तो पता चला कि असली दिक्कर कंपनियों को नाम से ही है। वे इस नाम के किसी भी व्यक्ति को क्रू सदस्य नहीं रखना चाहती है क्योंकि इससे लोगों को शक बना रहता है जो किसी भी शिपिंग कंपनी के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता है। 

उनका कहना है कि ये नाम उन्हें दादा ने ये सोचकर दिया था कि पोता बड़ा होकर एक अच्छा इंसान बनेगा। उन्होंने कभी भी नहीं सोचा था कि इराक के तानाशाह का नाम पोते को इतनी परेशानियां देगा। एक अंग्रेजी अखबार के अनुसार सद्दाम को अब तक करीब 6 महीनों में 40 बार नौकरी देने से कंपनियां मना कर चुकी हैं। हालांकि इसके बाद उन्होंने अपना नाम बदलकर सद्दाम हुसैन से साजिद हुसैन कर लिया। बावजूद इसके नौकरी के लिए जरूरी दस्तावेजों में आज भी वे सद्दाम हुसैन ही हैं। दसवीं-बारहवीं की मार्कशीट से लेकर वोटर आईडी और पासपोर्ट में भी उनका पुराना नाम ही है। 

इस समस्या से निजात के लिए जब उन्हें उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आई तो हारकर वे झारखंड हाईकोर्ट पहुंचे हैं। कोर्ट में उन्होंने नए नाम के दस्तावेज उपलब्ध कराने की मांग की है, जिससे वे नौकरी करने में कामयाब हो सकें। कोर्ट इस मामले में अब 5 मई को सुनवाई करेगा।  


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