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गाजी अटैकः 92 लोगों की मौत और पाकिस्तानी सबमरीन के मिटने की दास्तान

गाजी अटैकः 92 लोगों की मौत और पाकिस्तानी सबमरीन के मिटने की दास्तान

नई दिल्ली।
भारत और पाकिस्तान के रिश्ते हमेशा से ऐसे दोराहे पर रहे हैं जहां पर ‘दोस्ती‘ से ज्यादा वक्त दोनों देशों ने ‘दुश्मनी‘ के साथ बिताया है। 1971 में दोनों देशों का ये रिश्ता शायद अपने सबसे खराब दौर में था। भारत और पाकिस्तान के बीच उस युद्ध की एक कहानी पर अब फिल्म आई है ‘द गाजी अटैक‘। हम आपको बता रहे हैं वो दास्तान जिसके बारे में न पाकिस्तान कुछ कहता है और न ही भारत में कोई बात सुनी जाती है। 

1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था। पाकिस्तान की एक सबमरीन पीएनएस गाजी अरब सागर से चलकर भारत के एयरक्रॉफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत को मार गिराने के इरादे से कराची से निकली। हालांकि 4 दिसंबर को गाजी में विशाखापट्टनम में ब्लास्ट हो गया और ये सबमरीन इतिहास बन गई। अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक रिपोर्ट प्रकाशित कर बताया था कि गाजी अटैक से जुड़े सभी दस्तावेजों को 1980 में ही मिटा दिया गया था। 

1971 में पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर जुल्मो की इंतेहा कर दी। पाकिस्तानी सेना के सताए पूर्वी पाकिस्तान के लोग भारत में आने लगे। इसके बाद भारत ने पूर्वी पाकिस्तान को स्वतंत्र कराने का निर्णय लिया और जंग छिड़ गई। जमीनी लड़ाई के साथ पानी की लड़ाई भी लड़ी गई। 

बंगाल की खाड़ी में उस वक्त भारत ने देश के इकलौते एयरक्रॉफ्ट कैरियर आइएनएस विक्रांत को तैनात कर रखा था। विक्रांत को पानी में डुबो देने के लिए पाकिस्तान ने 14 नवम्बर 1971 को गाजी को रवाना किया। कराची से रवाना गाजी में 92 लोग थे। उस वक्त भारतीय नेवी ने एक संदेश को पकड़ा, जिसमें चितगांव की नेवी को एक स्पेशल लुब्रिकेंट के लिए कहा। ये सबमरीन में इस्तेमाल होता था। इसके बाद ही नेवी को पता लग गया कि ये सबमरीन गाजी है। 

इसके तुरंत बाद भारतीय नौसेना ने विक्रांत की देश के लिए अहमियत को देखते हुए उसे तुरंत अंडमान सागर की ओर रवाना कर दिया। विशाखापट्टनम से द्वितीय विश्वयुद्ध में लड़ चुके बरसों पुराने आईएनएस राजपूत को भेजा गया। साथ ही प्लान के मुताबिक राजपूत को ऐसे व्यवहार करना था जैसे वो ही विक्रांत हो। राजपूत ने इसके बाद दूसरे जहाजों को कई संदेश भेजे। इसका मकसद गाजी को ये बताना था कि वो ही आईएनएस विक्रांत है। यहां तक की एक बार तो एक सीक्रेट डॉक्यूमेंट भी लीक कर दिया गया, जिसमें लोकेशन का पता भी था। 

27 नवम्बर को विशाखापट्टनम में गाजी ने माइंस बिछाई और विक्रांत को खोजते हुए आगे बढ़ गए। हालांकि आईएनएस राजपूत से जब लगातार एक के बाद एक संदेश लीक होने लगे तो गाजी में मौजूद लोग भ्रम की स्थिति में पड़ गए। इसके बाद गाजी ने खतरनाक निर्णय लेते हुए उसी रास्ते से लौटने का निर्णय लिया जिस रास्ते से वे लोग आए थे। 

भारतीय नौसेना का इस मामले में कहना है कि 4 दिसंबर की रात को राजपूत को सिग्नल मिले। उस वक्त कंफर्म नहीं हो पाया कि ये कौन है? हालांकि सबको ये अंदाजा था कि गाजी के अलावा कोई हो ही नहीं सकता है। राजपूत के कैप्टन इंदर सिंह ने पानी के अदर दो फायर किए और उसके बाद गाजी नष्ट हो गया। 

1971 की लड़ाई के वक्त लेफ्टिनेंट जनरल जैकब ने अपने एक लेख में इस बारे में बताते हुए कहा कि तत्कालीन ईस्टर्न नेवी के कमांडिंग ऑफिसर कृष्णन ने उस वक्त कहा था कि गाजी का डूबना एक प्राकृतिक घटना थी। नेवी को ये मालूम ही नहीं था कि गाजी डूब गया है। इस बारे में मछुआरों ने गाजी के बारे में बताया तो उन्हें पुरस्कार दिया गया। बाद में कृष्णन ने कहा कि जो हमने बातें की हैं उसे भूल जाना। 

गाजी के मिट जाने और 92 लोगों के मारे जाने की ये घटना ऐसी है जिस पर न भारत में और न ही पाकिस्तान में कोई खास चर्चा सुनी जाती है। आखिर ऐसा क्या है कि युद्ध के वक्त 92 लोगों की एक साथ मौत को लेकर न सीमा के उस पार कोई बात होती है और न ही सीमा के इस पार। हालांकि गाजी और उस पर सवार इतने लोगों की मौत युद्धकाल में पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ा झटका थी।  


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